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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
यो विकर्मस्थितो विप्रो न स सन्मानमर्हति |  ११   क
कर्मस्वनुपय़ुञ्जानमविश्वास्यं हि तं विदुः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति