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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
परलोकगुरुं चैव राजानं योऽवमन्यते |  २८   क
न तस्य दत्तं न हुतं न श्राद्धं फलति क्वचित् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति