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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान्मरुद्गणवृतः प्रभुः |  ३२   क
जगाम भवनं विष्णुरक्षरं परमं पदम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति