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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
त्रैविद्यानां या गतिर्व्राह्मणानां; यश्चैवोक्तोऽथाश्रमो व्राह्मणानाम् |  ८   क
एतत्कर्म व्राह्मणस्याहुरग्र्य; मन्यत्कुर्वञ्शूद्रवच्छस्त्रवध्यः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति