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अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
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भीष्म उवाच
अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय़ परिचक्षते |  ५४   क
अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति