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अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
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भीष्म उवाच
सद्भ्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नरः |  ५८   क
न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति