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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपदीमुत्तरां चैव पृथां चाप्यवलोककः |  ५   क
समाश्वासय़ितुं चापि क्षत्रिय़ा निहतेश्वराः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति