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सभा पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते रथान्मेघसङ्काशानास्थाय़ सह कृष्णय़ा |  १७   क
प्रय़युर्हृष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति