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वन पर्व
अध्याय ६५
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सुदेव उवाच
चारुपद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव |  ११   क
इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति