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वन पर्व
अध्याय ६५
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सुदेव उवाच
कामभोगैः प्रिय़ैर्हीनां हीनां वन्धुजनेन च |  १७   क
देहं धारय़तीं दीनां भर्तृदर्शनकाङ्क्षय़ा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति