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वन पर्व
अध्याय ६५
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सुदेव उवाच
कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा |  २१   क
भर्तुः समागमात्साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति