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वन पर्व
अध्याय ६५
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वृहदश्व उवाच
ततः सुदेवमानाय़्य राजमाता विशां पते |  ३४   क
पप्रच्छ भार्या कस्येय़ं सुता वा कस्य भामिनी ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति