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वन पर्व
अध्याय ६५
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वृहदश्व उवाच
न चेच्छक्याविहानेतुं दमय़न्ती नलोऽपि वा |  ४   क
ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति