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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिंशदेनं सहस्राणि रथाः काञ्चनमालिनः |  १२   क
सदश्वैरुपसम्पन्नाः पृष्ठतोऽनुय़युः सदा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति