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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किङ्करा यथा |  १४   क
सर्वे च राजन्राजानो धनेश्वरमिवामराः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति