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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
एष वृद्धाननाथांश्च व्यङ्गान्पङ्गूंश्च मानवान् |  १७   क
पुत्रवत्पालय़ामास प्रजा धर्मेण चाभिभो ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति