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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रीप्रतापेन चैतस्य तप्यते स सुय़ोधनः |  १९   क
सगणः सह कर्णेन सौवलेनापि वा विभुः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति