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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमतः पाण्डवान्दृष्ट्वा ज्वलतः पावकानिव |  ५   क
अथ मत्स्योऽव्रवीत्कङ्कं देवरूपमवस्थितम् |  ५   ख
मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति