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विराट पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
परिहासेप्सय़ा वाक्यं विराटस्य निशम्य तत् |  ७   क
स्मय़मानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति