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उद्योग पर्व
अध्याय ६५
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धृतराष्ट्र उवाच
त्वमेतय़ोः सारवित्सर्वदर्शी; धर्मार्थय़ोर्निपुणो निश्चय़ज्ञः |  ५   क
स मे पृष्टः सञ्जय़ व्रूहि सर्वं; युध्यमानाः कतरेऽस्मिन्न सन्ति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति