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उद्योग पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
सम्पृच्छते धृतराष्ट्राय़ सञ्जय़; आचक्ष्व सर्वं यावदेषोऽनुय़ुङ्क्ते |  ९   क
सर्वं यावद्वेत्थ तस्मिन्यथाव; द्याथातथ्यं वासुदेवेऽर्जुने च ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति