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भीष्म पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
आचार्य सततं त्वं हि हितकामो ममानघ |  १८   क
वय़ं हि त्वां समाश्रित्य भीष्मं चैव पितामहम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति