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भीष्म पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
तत्राभिमन्युः सङ्क्रुद्धो द्रौपदेय़ाश्च मारिष |  २५   क
विव्यधुर्निशितैर्वाणैः सर्वांस्तानुद्यताय़ुधान् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति