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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
दोग्ध्रीश्च धेनूश्च सहस्रशो वै; सुवाससः काञ्चनवद्धशृङ्गीः |  ३०   क
हय़ांश्च नानाविधदेशजाता; न्यानानि दासीश्च तथा द्विजेभ्यः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति