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वन पर्व
अध्याय २८१
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सावित्र्यु उवाच
प्रजास्त्वय़ेमा निय़मेन संय़ता; निय़म्य चैता नय़से न कामय़ा |  ३३   क
अतो यमत्वं तव देव विश्रुतं; निवोध चेमां गिरमीरितां मय़ा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति