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द्रोण पर्व
अध्याय ६५
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धृतराष्ट्र उवाच
आहो स्विच्छकटव्यूहं प्रविष्टा मोघनिश्चय़ाः |  २   क
द्रोणमाश्रित्य तिष्ठन्तः प्राकारमकुतोभय़ाः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति