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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् |  ४५   क
ददौ प्रीत्या कुमाराय़ दण्डं चैव वृहस्पतिः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति