कर्ण पर्व  अध्याय ३२

सञ्जय़ उवाच

स पाण्डवरथांस्तूर्णं प्रविश्य विसृजञ्शरान् |  ३२   क
प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत्सप्तसप्ततिम् ||  ३२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति