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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
तौ शङ्खभेरीनिनदे समृद्धे; समीय़तुः श्वेतहय़ौ नराग्र्यौ |  १   क
वैकर्तनः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च; दुर्मन्त्रिते तव पुत्रस्य राजन् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति