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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
अभ्यक्रोशन्सोमकास्तत्र पार्थं; त्वरस्व याह्यर्जुन विध्य कर्णम् |  १०   क
छिन्ध्यस्य मूर्धानमलं चिरेण; श्रद्धां च राज्याद्धृतराष्ट्रसूनोः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति