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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
विद्रुतं तत्र तत्सैन्यं दृष्ट्वा भारत सात्यकिः |  ४३   क
अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णै रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति