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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
यय़ा धृत्या सर्वभूतान्यजैषी; र्ग्रासं ददद्वह्नय़े खाण्डवे त्वम् |  १५   क
तय़ा धृत्या सूतपुत्रं जहि त्व; महं वैनं गदय़ा पोथय़िष्ये ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति