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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
स वीर किं मुह्यसि नावधीय़से; नदन्त्येते कुरवः सम्प्रहृष्टाः |  १७   क
कर्णं पुरस्कृत्य विदुर्हि सर्वे; त्वदस्त्रमस्त्रैर्विनिपात्यमानम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति