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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
यय़ा धृत्या निहतं तामसास्त्रं; युगे युगे राक्षसाश्चापि घोराः |  १८   क
दम्भोद्भवाश्चासुराश्चाहवेषु; तय़ा धृत्या त्वं जहि सूतपुत्रम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति