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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
किरातरूपी भगवान्यया च; त्वय़ा महत्या परितोषितोऽभूत् |  २०   क
तां त्वं धृतिं वीर पुनर्गृहीत्वा; सहानुवन्धं जहि सूतपुत्रम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति