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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
स भीमसेनं च जनार्दनं च; किरीटिनं चाप्यमनुष्यकर्मा |  २६   क
त्रिभिस्त्रिभिर्भीमवलो निहत्य; ननाद घोरं महता स्वरेण ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति