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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा |  ३४   क
विस्मिता मानुषाश्चासन्दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति