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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
सुषेणमेकेन शरेण विद्ध्वा; शल्यं चतुर्भिस्त्रिभिरेव कर्णम् |  २८   क
ततः सुमुक्तैर्दशभिर्जघान; सभापतिं काञ्चनवर्मनद्धम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति