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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
स राजपुत्रो विशिरा विवाहु; र्विवाजिसूतो विधनुर्विकेतुः |  २९   क
ततो रथाग्रादपतत्प्रभग्नः; परश्वधैः शाल इवाभिकृत्तः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति