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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
ते वर्म भित्त्वा पुरुषोत्तमस्य; सुवर्णचित्रं न्यपतन्सुमुक्ताः |  ३८   क
वेगेन गामाविविशुः सुवेगाः; स्नात्वा च कर्णाभिमुखाः प्रतीय़ुः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति