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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
प्रवृद्धशृङ्गद्रुमवीरुदोषधी; प्रवृद्धनानाविधपर्वतौकसौ |  ४   क
यथाचलौ वा गलितौ महावलौ; तथा महास्त्रैरितरेतरं घ्नतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति