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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
ततः शरौघैः प्रदिशो दिशश्च; रविप्रभा कर्णरथश्च राजन् |  ४१   क
अदृश्य आसीत्कुपिते धनञ्जय़े; तुषारनीहारवृतं यथा नभः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति