वन पर्व  अध्याय १९२

मार्कण्डेय़ उवाच

यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः |  ७   क
धुन्धुमारत्वमगमत्तच्छृणुष्व महीपते ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति