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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
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कुन्त्यु उवाच
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः |  ५   क
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति