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वन पर्व
अध्याय २७४
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मार्कण्डेय़ उवाच
ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरय़ूथपाः |  ४   क
द्रुमैर्विध्वंसय़ां चक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति