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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
समागम्य ततः सर्वे वरुणं सागरालय़म् |  ९   क
अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति