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सभा पर्व
अध्याय ४८
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दुर्योधन उवाच
तत्र स्म द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् |  १८   क
कृतकाराः सुवलय़स्ततो द्वारमवाप्स्यथ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति