सभा पर्व  अध्याय ५८

शकुनिरु उवाच

वहु वित्तं पराजैषीर्भ्रातॄंश्च सहय़द्विपान् |  २६   क
आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय़ यदि तेऽस्त्यपराजितम् ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति