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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
पिप्लुं दृष्ट्वा सुनन्दा च राजमाता च भारत |  ११   क
रुदन्त्यौ तां परिष्वज्य मुहूर्तमिव तस्थतुः |  ११   ख
उत्सृज्य वाष्पं शनकै राजमातेदमव्रवीत् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति