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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
यथैव ते पितुर्गेहं तथेदमपि भामिनि |  १४   क
यथैव हि ममैश्वर्यं दमय़न्ति तथा तव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति